भारत और चीन के बीच दशकों से चल रहे सीमा विवाद और कूटनीतिक उतार-चढ़ाव के बीच एक नया मोड़ देखने को मिल रहा है। चीन ने खुले तौर पर अमेरिका पर यह आरोप लगाया है कि वह नई दिल्ली और बीजिंग के बीच सुधरते रिश्तों में 'रोड़ा' अटकाने की कोशिश कर रहा है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान का यह बयान उस समय आया है जब हाल के महीनों में दोनों एशियाई दिग्गजों के बीच संवाद के रास्ते दोबारा खुलते दिखाई दिए हैं।
चीन का रुख: सीमा विवाद और बाहरी दखल
चीन के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत के साथ उसका सीमा विवाद एक द्विपक्षीय मामला है। लिन जियान के अनुसार, किसी भी तीसरे देश, विशेषकर अमेरिका को इसमें हस्तक्षेप करने या टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। चीन का तर्क है कि वह भारत के साथ अपने संबंधों को केवल एक तात्कालिक सीमा विवाद के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखता है। चीन यह संदेश देना चाहता है कि वह अपनी पश्चिमी सीमा पर स्थिरता चाहता है ताकि वह अपने वैश्विक आर्थिक एजेंडे पर ध्यान केंद्रित कर सके।
पेंटागन की रिपोर्ट और अमेरिकी चिंताएं
अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) की हालिया रिपोर्ट ने इस मामले में आग में घी डालने का काम किया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि:
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रणनीतिक चाल: चीन सीमा पर जारी तनाव का उपयोग भारत को शांत रखने और अमेरिका-भारत के बीच बढ़ती सैन्य साझेदारी को कमजोर करने के लिए कर रहा है।
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पाकिस्तान के साथ जुड़ाव: रिपोर्ट के अनुसार, चीन एक तरफ भारत से दोस्ती की बात करता है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान को 36 J-10C लड़ाकू विमान और आधुनिक फ्रिगेट जहाज देकर भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा रहा है।
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भरोसे की कमी: अमेरिका का मानना है कि अरुणाचल प्रदेश और एलएसी (LAC) पर चीन के 'दोहरे रवैये' के कारण दोनों देशों के बीच भरोसे की भारी कमी है।
2024-25: संघर्ष से साझेदारी की ओर?
साल 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए थे। हालांकि, 2024 के अंत और 2025 की शुरुआत में स्थितियों में बदलाव देखा गया। 2025 के ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात को एक 'बर्फ पिघलने' वाली घटना माना जा रहा है। इस बैठक से यह संकेत मिला कि दोनों देश अब प्रतिस्पर्धा को पीछे छोड़कर साझेदारी की ओर बढ़ने के इच्छुक हैं, ताकि आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता पर ध्यान दिया जा सके।
भारत का सतर्क रवैया: 'देखो और प्रतीक्षा करो'
चीन की इन कूटनीतिक पहल के बावजूद भारत सरकार का रुख 'अत्यंत सतर्क' बना हुआ है। भारत के लिए चीन के शब्दों से ज्यादा उसके कार्य (Actions) मायने रखते हैं। भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान का मानना है कि:
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सीमा पर शांति अनिवार्य है: जब तक एलएसी पर पूरी तरह से सेना पीछे नहीं हटती (Disengagement), तब तक रिश्तों को सामान्य नहीं माना जा सकता।
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आर्थिक निर्भरता: भारत चीन के साथ अपने व्यापार घाटे और तकनीकी निर्भरता को कम करने पर भी काम कर रहा है।
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अमेरिका से संतुलन: भारत अपनी संप्रभुता के लिए अमेरिका के साथ अपनी सुरक्षा साझेदारी को भी उतना ही महत्व दे रहा है।
निष्कर्ष
चीन का यह कहना कि अमेरिका उनके रिश्तों में दखल दे रहा है, असल में भारत को यह समझाने की कोशिश है कि वह पश्चिम के प्रभाव से बाहर निकलकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाए। हालांकि, भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक हितों को बचाए रखते हुए चीन के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व कैसे सुनिश्चित करे। भविष्य में भारत-चीन संबंधों की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि सीमा पर शांति के समझौते कागजों से निकलकर जमीन पर कितने प्रभावी रूप से लागू होते हैं।