बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और असहिष्णुता ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। मयमनसिंह (Mymensingh) इलाके में एक हिंदू बंगाली गारमेंट वर्कर, दीपू चंद्र दास, की भीड़ द्वारा बेरहमी से की गई हत्या की घटना ने मानवता को शर्मसार कर दिया है। हाल ही में बांग्लादेशी समाचार चैनल 'जमुना टीवी' द्वारा जारी किए गए एक वीडियो ने इस जघन्य हत्याकांड की भयावहता को उजागर कर दिया है।
वीडियो में कैद आखिरी पलों की खौफनाक तस्वीर
वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि एक गारमेंट फैक्ट्री के विशाल नीले रंग के लोहे के गेट के बाहर दर्जनों उन्मादी लोग जमा हैं। भीड़ उत्तेजित होकर नारे लगा रही है और अंदर से गेट खुलने का इंतजार कर रही है। कुछ ही पलों बाद, फैक्ट्री का दरवाजा खोला जाता है और दीपू चंद्र दास को 'शिकार' की तरह भीड़ के हवाले कर दिया जाता है। वीडियो के ये अंश किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकते हैं, क्योंकि यह स्पष्ट दिखता है कि एक निहत्थे व्यक्ति को मौत के मुंह में धकेल दिया गया।
बिना सबूत के 'ईशनिंदा' का आरोप
दीपू चंद्र दास पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने इस्लाम के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की है। बांग्लादेश की भीड़तंत्र वाली न्याय व्यवस्था में अक्सर इसी तरह के आरोपों का सहारा लेकर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जाता है। हालांकि, इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बांग्लादेशी अधिकारियों और जांच एजेंसियों ने स्पष्ट किया है कि दीपू के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है, जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाई थी। यह केवल एक सुनियोजित भीड़िया तंत्र का हिस्सा था।
बर्बरता की पराकाष्ठा: तस्लीमा नसरीन का दावा
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दीपू की हत्या केवल पीट-पीटकर नहीं की गई, बल्कि बर्बरता की सभी हदें पार कर दी गईं। आरोप है कि भीड़ ने उन्हें निर्वस्त्र किया, एक पेड़ से बांधा और फिर जिंदा जला दिया।
मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन ने इस वीडियो को सोशल मीडिया (X) पर साझा करते हुए गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने दावा किया कि दीपू को किसी धार्मिक अपराध के कारण नहीं, बल्कि पुरानी रंजिश और निजी दुश्मनी को भुनाने के लिए निशाना बनाया गया। तस्लीमा नसरीन ने यह भी आरोप लगाया कि दीपू को बचाने के बजाय पुलिस कर्मियों और फैक्ट्री के फ्लोर मैनेजर ने खुद उसे उग्र भीड़ के हवाले कर दिया, जो प्रशासन और कार्यस्थल की सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
अल्पसंख्यकों की असुरक्षा और वैश्विक चिंता
बांग्लादेश में पिछले कुछ महीनों में राजनीतिक अस्थिरता के बीच हिंदू समुदाय को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। दीपू चंद्र दास की हत्या केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह उस असुरक्षित माहौल का प्रतीक है जहाँ 'ईशनिंदा' का एक झूठा आरोप किसी की जान लेने के लिए पर्याप्त होता है।
मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। मांग की जा रही है कि:
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वीडियो में दिख रहे उपद्रवियों की पहचान कर उन्हें सख्त सजा दी जाए।
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उन पुलिसकर्मियों और फैक्ट्री अधिकारियों पर कार्रवाई हो, जिन्होंने दीपू को भीड़ के हवाले किया।
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अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने वाली विचारधारा और झूठे ईशनिंदा के आरोपों पर लगाम कसी जाए।