मच्छरों को लेकर एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा हुआ है जिसने वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। एक नए शोध के अनुसार, मच्छर अब दुनिया के सबसे लोकप्रिय मॉस्किटो रिपेलेंट (मच्छर भगाने वाली दवा) 'डीईईटी' (DEET) से दूर भागने के बजाय उसकी ओर आकर्षित होना सीख रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव आने वाले समय में मच्छरों पर काबू पाने की हमारी रणनीतियों को फेल कर सकता है।
क्या है पूरा मामला?
जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी (Journal of Experimental Biology) में प्रकाशित इस स्टडी को वर्जीनिया टेक और फ्रांस की यूनिवर्सिटी ऑफ टूर्स के शोधकर्ताओं ने मिलकर किया है। इसमें पाया गया कि यदि मच्छरों को बार-बार 'DEET' के संपर्क में लाया जाए, तो वे धीरे-धीरे इसके आदी हो जाते हैं और समय के साथ यह केमिकल उनके लिए बेअसर हो जाता है।
शोधकर्ताओं ने बताया कि मच्छर 'एसोसिएशन' (संबंध जोड़ना) के जरिए सीख रहे हैं। यह बिल्कुल रूसी वैज्ञानिक इवान पावलोव के उस मशहूर प्रयोग जैसा है, जिसमें एक कुत्ता घंटी की आवाज को भोजन से जोड़कर देखना सीख जाता है। ठीक इसी तरह, मच्छर भी रिपेलेंट की खुशबू को 'भोजन' (खून) मिलने के इनाम से जोड़कर देखने लगे हैं।
शोध में कैसे हुआ खुलासा?
वैज्ञानिकों ने इस थ्योरी को जांचने के लिए 'येलो फीवर मॉस्किटो' (Aedes aegypti) पर एक प्रयोग किया। यह मच्छरों की वही प्रजाति है जो डेंगू, जीका, चिकनगुनिया और येलो फीवर जैसी खतरनाक बीमारियां फैलाती है।
- पहला टेस्ट: मच्छरों को एक जाली के पीछे रखा गया, जिसके पार उनके लिए खून का इंतजाम था। जब भी मच्छर काटने की कोशिश करते, शोधकर्ताओं ने वहां DEET की खुशबू छोड़ दी। इस प्रक्रिया को चार बार दोहराने के बाद, 60% से अधिक मच्छर सिर्फ DEET की गंध पाकर ही भोजन की तलाश में आगे बढ़ने लगे।
- दूसरा टेस्ट: मच्छरों के सामने दो इंसानी हाथ रखे गए—एक सामान्य हाथ और दूसरे पर DEET रिपेलेंट लगा था। जिन मच्छरों को पहले ट्रेनिंग नहीं मिली थी, वे रिपेलेंट वाले हाथ से दूर भागे। लेकिन जो मच्छर इसके आदी हो चुके थे, वे सीधे DEET लगे हाथ की तरफ आकर्षित हुए।
क्यों बढ़ गई है चिंता?
शोध के सह-लेखक क्लेमेंट विनौगर ने बताया कि असल जिंदगी में जब कोई व्यक्ति अपने शरीर पर रिपेलेंट लगाता है, तो कुछ घंटों बाद उसका असर कम होने लगता है। ऐसे में यदि कोई मच्छर उस हल्के असर के बावजूद इंसान को काटने में कामयाब हो जाता है, तो उसका दिमाग इस गंध को 'सफल शिकार' (इनाम) के रूप में याद रखता है। अगली बार वह इसी गंध वाले व्यक्ति की तरफ तेजी से खिंचा चला आता है।
बेंगलुरु के एस्टर आरवी हॉस्पिटल के इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. अरविंद एस. एन. ने इस पर चिंता जताते हुए कहा, "यह काफी चिंताजनक है क्योंकि हम डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों से बचने के लिए पूरी तरह DEET आधारित रिपेलेंट पर निर्भर हैं।"
सिर्फ रिपेलेंट के भरोसे न रहें, अपनाएं ये उपाय:
विशेषज्ञों का कहना है कि अब समय आ गया है कि हम केवल मॉस्किटो रिपेलेंट के भरोसे रहना छोड़ें। मच्छरों से सुरक्षित रहने के लिए निम्नलिखित उपाय बेहद जरूरी हैं:
- कपड़ों का चुनाव: बाहर निकलते समय पूरी आस्तीन की शर्ट, फुल पैंट और हल्के रंग के कपड़े पहनें (मच्छर गहरे रंगों की ओर ज्यादा आकर्षित होते हैं)।
- पानी जमा न होने दें: गमलों, कूलरों, छतों या नालियों में कहीं भी पानी इकट्ठा न होने दें, क्योंकि यही मच्छरों के पनपने की मुख्य जगह होती है।
- घरों की सुरक्षा: सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करें और शाम के वक्त खिड़की-दरवाजों को बंद रखें या उन पर जाली लगवाएं।
मच्छर दुनिया के सबसे घातक जीवों में गिने जाते हैं, जो हर साल दुनिया भर में लगभग 10 लाख मौतों का कारण बनते हैं। ऐसे में मच्छरों की यह 'सीखने की क्षमता' भविष्य में स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।